नजर में अहंकार: क्यों ‘द इकॉनमिस्ट’ भारत की सोच को समझ नहीं पाया
- GHTN Admin
- 8 अप्रैल
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अपडेट करने की तारीख: 9 अप्रैल
लेखक: डॉ. विनय नलवा

दुनिया के मीडिया में एक पैटर्न दिख रहा है। भारत में आत्मविश्वास दिखे तो उसे बहुसंख्यकवाद कहा जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा की बात हो तो उसे प्रचार बता दिया जाता है और हाल ही में पत्रिका द इकॉनमिस्ट ने फिल्म धुरंधर: द रिवेंज पर एक लेख लिखा जिसका इसका शीर्षक था - क्या यह फिल्म नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार है?
यह सिर्फ फिल्म की समीक्षा नहीं है। यह भारतीय समाज को एक नजर से आंकने की कोशिश है। लेख की शुरुआत अजीब तुलना से होती है। लेख में फिल्म देखने के अनुभव को नशे जैसा बताया गया है। यह आलोचना नहीं है। यह मजाक उड़ाने जैसा है। इस तरह की भाषा यह दिखाती है कि लेखक भारतीय दर्शकों को समझदार नहीं मानता। जैसे लोग कला नहीं समझते, सिर्फ नशे के पीछे भागते हैं।
फिल्म ने 1400 करोड़ से ज्यादा कमाई की। इसे सिर्फ प्रचार का असर बताना गलत है। यह दर्शकों का अपमान है। यह दिखाता है कि कुछ लोग अब भी तय करना चाहते हैं कि भारत के लिए क्या सही है। अब जब लोग खुद तय कर रहे हैं, तो उनके लिए कहा जाता है कि वो किसी प्रभाव में हैं। लेख में फिल्म की हिंसा और भावनात्मक असर को भी खारिज किया गया है। लेकिन एक बड़ी बात नजरअंदाज की गई।
यह भावनाएं अचानक नहीं आतीं। ये कई सालों के अनुभव से आती हैं। फिल्म में दिखाए गए विषय असली घटनाओं से जुड़े हैं। जैसे 1999 में विमान अपहरण, 2001 संसद हमला और 2008 मुंबई हमला। ये घटनाएं लोगों के मन में आज भी जिंदा हैं। इन्हें प्रचार कहना इन दर्दनाक यादों को नजरअंदाज करना है। कश्मीर से पंडितों का पलायन और सैनिकों के साथ हुई यातनाएं भी इसी सच्चाई का हिस्सा हैं।
लेख में फिल्म की कहानी को इतिहास बदलने की कोशिश कहा गया। लेकिन सवाल यह है कि जब पश्चिम की फिल्में इतिहास बदलती हैं, तो उन्हें कला कहा जाता है। और जब भारत ऐसा करता है तो उसे गलत बताया जाता है।
लेख में भारत की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए। जैसे असल जिंदगी में भारत कमजोर है और फिल्मों में खुद को मजबूत दिखाता है। यह सोच भारत को कम करके दिखाने की कोशिश है। हॉलीवुड लंबे समय से अपने देश को ताकतवर दिखाता रहा है। उसे कहानी कहा जाता है। लेकिन भारत ऐसा करे तो उसे प्रचार कहा जाता है।
आज जो प्रचार कहा जा रहा है, वह असल में कहानी पर अपना हक जताना है। पहले भारतीय सिनेमा एक तय सोच के अंदर रहता था। उसे कभी प्रचार नहीं कहा गया, भले ही उसमें पक्षपात था। अब फर्क सिर्फ दिशा का है। फिल्में जैसे कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरी और धुरंधर एक नए भारत को दिखाती हैं। एक ऐसा भारत जो खुद अपनी कहानी बताना चाहता है।
दुनिया के कुछ लोगों को असल परेशानी फिल्म से नहीं है। उन्हें भारत का आत्मविश्वास खटक रहा है। भारत की तरक्की सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। अब भारत अपनी कहानी खुद लिख रहा है। इसे प्रचार कहना असली बात को समझने से चूकना है। यह सिर्फ एक फिल्म की बहस नहीं है। यह उस देश की बात है जो अब खुद को नए नजरिए से देख रहा है।
(लेखक एक लेखक और स्तंभकार हैं।)
यह आलेख पहले न्यू इंडिया अब्रॉड डॉट कॉम में प्रकाशित हो चुका है।



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